कोविड-19 के कहर के बीच उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे बड़ी संख्या में दफ़न मिले शव: रिपोर्ट

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश के उन्नाव में 900 से अधिक शवों को नदी के किनारे दफनाया गया था. इसी तरह कन्नौज में यह संख्या 350, कानपुर में 400 और गाजीपुर में 280 है.

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश के उन्नाव में 900 से अधिक शवों को नदी के किनारे दफनाया गया था. इसी तरह कन्नौज में यह संख्या 350, कानपुर में 400 और गाजीपुर में 280 है.

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच गंगा किनारे रेत में दफन शव. (फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच गंगा किनारे रेत में दफन शव. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: बिहार के बक्सर जिले के चौसा में गंगा किनारे 71 कोविड-19 संदिग्ध मृतकों के शव मिलने के बाद अब कई अंग्रेजी और हिंदी अखबारों ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में 2000 से अधिक शव आधे-अधूरे तरीके या जल्दबाजी में दफनाए गए या गंगा किनारे पर मिले हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह की घटनाएं गाजियाबाद, कानपुर, उन्नाव, गाजीपुर, कन्नौज और बलिया क्षेत्रों में दर्ज की गईं जो कि महामारी से बुरी तरह से प्रभावित हैं.

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह अकेले उन्नाव में 900 से अधिक शवों को नदी के किनारे दफनाया गया था. उसने कन्नौज में यह संख्या 350, कानपुर में 400, गाजीपुर में 280 बताई. उसने बताया कि मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे शवों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

जब इंडियन एक्सप्रेस ने कुछ पीड़ितों के परिवार के सदस्यों का साक्षात्कार लिया, तो उन्होंने खुलासा किया कि उनके पास या तो पर्याप्त पैसे नहीं थे या मृतकों को सम्मानजनक दाह संस्कार करना कलंकित महसूस किया.

इस हफ्ते भारी बारिश के बाद उन्नाव में कम से कम ऐसे 200 शव गंगा किनारे रेत के नीचे दबे हुए थे. गाजीपुर के गहमर घाट पर मुश्किल से तीन फीट के कब्र के नदी के पानी में बह जाने के बाद गाजियाबाद में ऐसे कम से कम पांच शव पाए गए, जिन पर किसी ने दावा नहीं किया. वहीं, कई शव नदी में तैरते हुए मिले जिन्हें संभवतया छोड़ दिया गया.

एक श्मशान घाट की कर्मचारी कमला देवी डोम ने कहा, ‘ऐसा दृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था. शवों को किनारे लाने के लिए हमने नावों का इस्तेमाल किया. पूरे इलाके में मौत का कहर फैल गया है. गंगाजी यहां गहमर में मुड़ती हैं, इसलिए नीचे की ओर बहते हुए शव यहां जमा होते हैं. यहां 80 से कम शव नहीं होंगे.’

हिंदुस्तान टाइम्स ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में उन्नाव, बलिया और गाजीपुर में गंगा के तट पर सैकड़ों उथली कब्रें खोजी गई हैं.

अखबार ने कहा, ‘उत्तर प्रदेश के बलिया और गाजीपुर जिलों और बिहार के बक्सर और पटना जिलों में गंगा में कम से कम 150 लाशें तैरती मिलीं, जिसके बाद केंद्र सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लिया.’

कन्नौज निवासी अजय दीप सिंह बैस ने कहा, ‘यहां लोगों को दफनाने की परंपरा है, लेकिन इतनी कब्रें मैंने पहले कभी नहीं देखीं.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार से ही जिला प्रशासन शवों का अंतिम संस्कार करने या उन्हें रेत में दफनाने के लिए संघर्ष का सामना कर रहा है.

इस बीच, आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अपने गृह विभाग को राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) और पीएसी की जल पुलिस को सभी नदियों में शवों के डंपिंग को रोकने के लिए गश्त करने के लिए तैनात करने का आदेश दिया है.

उन्नाव के जिला मजिस्ट्रेट रवींद्र कुमार ने कहा कि राज्य प्रशासन लोगों को दाह संस्कार के लिए मनाने की पूरी कोशिश कर रहा है. हालांकि, कई लोगों ने शिकायत की कि महामारी में हताहतों की बढ़ती संख्या के कारण दाह संस्कार की लागत कई गुना बढ़ गई है.

एक श्मशान घाट पर नाई का काम करने वाले प्रदीप कुमार ने कहा, ‘एक चिता जिसकी कीमत पहले लगभग 500 रुपये थी, अब उसकी कीमत लगभग 1,500 रुपये से 2,000 रुपये है और दाह संस्कार की पूरी प्रक्रिया में लगभग 10,000 रुपये खर्च होते हैं.

उसने कहा, ‘करीब 15 दिन पहले ही एक स्थानीय निवासी का शव रेत में दफनाया गया था. वह शराबी था. हाल ही में हुई बारिश के बाद रेत बह गई और कुत्तों ने उसके शरीर को खोदा. मैं देख रहा हूं कि बहुत से लोग यहां शवों को दफना रहे हैं, क्योंकि वे उनका दाह संस्कार नहीं कर सकते हैं.’

शुक्रवार को अपने 87 वर्षीय पिता प्यारे लाल को दफनाने वाले खेत में काम करने वाले मोटू कश्यप ने पूछा, ‘मेरे पास लकड़ी खरीदने, पुजारी को भुगतान करने और शव का दाह संस्कार करने के लिए पैसे कैसे होंगे?’

शुक्रवार को भारी बारिश के बाद सैकड़ों दफन स्थान उजागर हो गए, जिसके बाद जहां दफन शव देखे जा रहे हैं, जिससे वहां के लोगों में लोगों में दहशत है.

उन्नाव के बस्कर घाट पर आस-पड़ोस के जिलों के लोग भी शवों को दफनाने आते हैं और पिछले कुछ हफ्तों में वहां शवों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई, लेकिन दाह संस्कार का खर्च उठा पाने में विफल होने के कारण उन्होंने शवों को दफना दिया.

अपनी मां का अंतिम संस्कार करने वाले एक दिहाड़ी मजदूर के परिवार ने कहा, ‘सामान्य तौर पर घाटों पर 600 रुपये प्रति क्विंटल में लकड़ियां मिलती हैं और एक शव को जलाने के लिए तीन क्विंटल लकड़ी की आवश्यकता होती है. अब हमसे 1000 रुपये प्रति क्विंटल मांगा जा रहा है. इसके बाद डोम, घी और दाह संस्कार में 4500 रुपये लग जाते हैं. हमारे पास इतना पैसा नहीं है. हम यह केवल इसलिए कर सके क्योंकि प्रशासन ने लकड़ियों की व्यवस्था की थी.’

एक पुलिस अधिकारी हरि नारायण शुक्ला ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि उनकी टीमें 25 किलोमीटर की दूरी पर गश्त कर रही हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शवों को नदी में नहीं फेंका जाए. लोग कोविड से डरते हैं और शवों को छूना नहीं चाहते हैं. लकड़ी की भी है कमी.

बिहार में यूपी के पूर्व की ओर राज्य प्रशासन ने कठोर कदम उठाते हुए गंगा नदी के माध्यम से राज्य में बहने वाले शवों को निकालना शुरू कर दिया है. उसने शवों को निकालने के लिए यूपी और बिहार की सीमा से लगे रानीघाट में नदी में एक बड़ा जाल बिछा दिया है.

बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा ने इस कदम के बारे में सूचित करने के लिए ट्वीट किया और कहा कि सभी बरामद शवों का प्रोटोकॉल के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया.

बक्सर के सिविल सर्जन जितेंद्र नाथ ने लोगों को स्नान और अन्य उद्देश्यों के लिए नदी के पानी का उपयोग नहीं करने की सलाह दी, ताकि सड़ी हुई लाशों से संक्रमित होने का खतरा न हो.

हालांकि, राज्य के किसी भी अधिकारी ने पुष्टि नहीं की कि जो शव नदी में तैरते हुए पाए गए थे, वे कोविड-19 पॉजिटिव थे. फिर भी वे शवों को राज्य में बहने से रोकने के लिए अपने यूपी समकक्षों के संपर्क में हैं.

पटना हाईकोर्ट ने भी बिहार सरकार को इस मामले में गुरुवार तक हलफनामा दाखिल करने को कहा है, ताकि यूपी सरकार पर कुछ कार्रवाई करने के लिए दबाव डाला जा सके.

शवों को बहाने पर गंगा समिति ने यूपी, बिहार से मांगी रिपोर्ट

नदियों में शवों को छोड़े पर संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने शनिवार को उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार से दो दिन में एक विस्तृत रिपोर्ट देने के लिए कहा.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने बताया कि एनएमसीजी ने शनिवार को जल शक्ति सचिव पंकज कुमार की अध्यक्षता में हुई बैठक के दौरान दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों को यह जानकारी दी.

एक सूत्र ने कहा, दोनों राज्यों को नदी और उसकी सहायक नदियों में शवों के डंपिंग के मुद्दे पर एक विस्तृत रिपोर्ट देने के लिए कहा गया.

सूत्रों ने कहा कि गंगा के पानी की गुणवत्ता पर तैरते शवों का प्रभाव भी चर्चा का मुद्दा था. सूत्रों ने कहा, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से गंगा जल के सैंपलिंग की आवृत्ति बढ़ाने को कहा गया है.

सूत्रों ने कहा कि राज्यों को गंगा नदी में शवों को फेंकने से रोकने के लिए सभी जिलों को सतर्क करते हुए महत्वपूर्ण जिलों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया है.

सूत्रों ने कहा, न केवल शवों को नदियों में फेंकना बल्कि नदियों के किनारे रेत में दफनाने को भी रोकने की जरूरत है.

केंद्र और राज्यों को एनएचआरसी का निर्देश: मृतकों के सम्मान के लिए विशेष कानून बनाएं

बीते 14 मई को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को परामर्श जारी करके मृतकों के अधिकार एवं सम्मान की रक्षा हेतु कानून बनाने सहित कई सिफारिशें की थी.

आयोग की अनुशंसा में विशेष कानून बनाने का सुझाव दिया गया है, ताकि मृतकों के अधिकारों की रक्षा की जा सके.

एनएचआरसी ने कहा था, ‘शवों को सामूहिक रूप से दफनाया नहीं जाना चाहिए या दाह संस्कार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह मृतक के सम्मान और अधिकार का उल्लंघन है.’

आयोग ने अनुशंसा की, ‘अस्पताल प्रशासन को भुगतान लंबित होने पर किसी मरीज के शव को रोकने से सख्ती से रोका जाना चाहिए. लावारिस शवों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए.’

आयोग ने कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा नदी में शव मिलने के बाद यह परामर्श अहम है, क्योंकि उसने इस संबंध में केंद्र और दोनों राज्यों को भी नोटिस जारी करके रिपोर्ट तलब की है.

मौतों की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर

बीते 13 मई को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर ऐसे कई लोगों की मौत की जांच की मांग की गई, जिनके शव बिहार और उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में बहते पाए गए थे. याचिका में मौत की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष जांच टीम गठित करने का आग्रह किया गया.

याचिका में केंद्र, उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकारियों को निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि नदी में बहते पाए गए शवों का पोस्टमार्टम कराया जाए, ताकि मौत के कारणों का पता चल सके.

वकील प्रदीप कुमार यादव और विशाल ठाकरे ने याचिका दायर कर दावा किया कि क्षत-विक्षत शवों की बरामदगी गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि नदी कई इलाकों के लिए जल स्रोत का काम करती है और अगर शव कोविड-19 से संक्रमित पाए गए तो यह दोनों राज्यों के गांवों तक फैल सकता है.

इसमें दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारें जिम्मेदारी से भाग रही हैं और यह पता लगाने के बजाय कि किस तरह से इन शवों को नदी में फेंका गया, उनके बीच ‘‘आरोप-प्रत्यारोप’’ चल रहा है और इसलिए उच्चतम न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन करने की जरूरत है, ताकि मौत की जांच की निगरानी की जा सके.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)