आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम कर रहे जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा से बातचीत.
नई दिल्ली में बीते एक अप्रैल को आदिवासियों ने अपनी विभिन्न मांगों के लिए प्रदर्शन किया था. (फोटो: पीटीआई)
बीते एक अप्रैल को विभिन्न राज्यों के आदिवासियों ने अपनी मांगों के समर्थन में दिल्ली में संसद का घेराव किया था. इस घेराव का नेतृत्व मध्य प्रदेश के आदिवासियों के एक संगठन जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) ने किया था.
इस संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा हैं, जो मध्य प्रदेश के धार ज़िले के रहने वाले हैं और मनावर तहसील में अपना एक निजी क्लीनिक चलाते हैं. वे 2016 में दिल्ली के एम्स में कार्यरत थे, जिसे छोड़कर वे आदिवासी समुदाय के लिए काम करने मनावर जाकर बस गए और जयस की स्थापना की.
ग़ौरतलब है कि जयस वही संगठन है जिसने बीते वर्ष मध्य प्रदेश में हुए छात्रसंघ चुनावों में धार, झाबुआ, बड़वानी और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल ज़िलों में मज़बूती से जमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, साथ ही कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देते हुए अपने पहले ही चुनाव में 162 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
हीरालाल के मुताबिक जयस ऐसी सफलता इसलिए हासिल कर सका क्योंकि आज़ादी के बाद से ही हाशिये पर धकेल दिए गए आदिवासी समुदाय को एक ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत थी जो उसकी आवाज़ बन सके, इस काम में कांग्रेस, भाजपा और अन्य राजनीतिक दल असफल रहे थे.
अब जयस की आगे की नीति है कि वह छात्र राजनीति से उठकर आदिवासियों के हक़ के लिए बड़े पैमाने पर आवाज़ उठाए.
इसी कड़ी में बीते दिनों धार ज़िले के मनावर में आदिवासी महापंचायत का आयोजन किया गया था, उसके बाद संविधान की 5वीं अनुसूची का कड़ाई से अनुपालन करने और जनजातीय समुदाय संबंधित अन्य मांगों के समर्थन में संसद का घेराव भी किया गया.
आदिवासी समुदाय की समस्याओं, उसके विकास और उसकी मांगों के संबंध में डॉ. हीरालाल अलावा से बातचीत के अंश…
5वीं अनुसूची क्या है? जिसकी अनुपालना के लिए आप आंदोलन कर रहे हैं?
आदिवासियों के लिए संविधान में 5वीं अनुसूची बनाई गई क्योंकि आदिवासी इलाके आज़ादी के पहले भी स्वतंत्र थे. वहां, अंग्रेज़ों का शासन-प्रशासन नहीं था. तब इन इलाकों को बहिष्कृत और आंशिक बहिष्कृत की श्रेणी में रखा गया.
1947 में आज़ादी के बाद जब 1950 में संविधान लागू हुआ तो इन क्षेत्रों को 5वीं और छठी अनुसूची में वर्गीकृत किया गया.
जो पूर्णत: बहिष्कृत क्षेत्र थे उन्हें छठी अनुसूची में डाला गया. जिसमें पूर्वोत्तर के चार राज्य हैं- त्रिपुरा, मेघालय, असम और मिज़ोरम.
और जो आंशिक बहिष्कृत क्षेत्र थे, अंग्रेजों ने वहां भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया. उन्हीं क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में डाला गया. इसमें दस राज्य शामिल हैं, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश.
संविधान में 5वीं अनुसूची के निर्माण के समय तीन बातें स्पष्ट तौर पर कही गईं- सुरक्षा, संरक्षण और विकास.
मतलब कि आदिवासियों को सुरक्षा तो देंगे ही, उनकी क्षेत्रीय संस्कृति का संरक्षण और विकास भी किया जाएगा, जिसमें उनकी बोली, भाषा, रीति-रिवाज़ और परंपराएं शामिल हैं.
5वीं अनुसूची में शासन और प्रशासन पर नियंत्रण की बात भी कही गई है. ऐसी व्यवस्था है कि इन क्षेत्रों का शासन-प्रशासन आदिवासियों के साथ मिलकर चलेगा.
मतलब इन क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में एक तरह से विशेषाधिकार मिले, स्वशासन की व्यवस्था की गई. जिसके तहत इन क्षेत्र में सामान्य क्षेत्र के आम क़ानून लागू नहीं होते. स्वशासन के लिए संविधान में ग्रामसभा को मान्यता दी गई है.
जैसे कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग परंपराएं हैं. मध्य प्रदेश में पटेल, झारखंड में मुंडा, मानकीय और पहान, ये व्यवस्थाएं चली आ रही हैं.
इन प्राचीन कबीलाई व्यवस्थाओं में एक ढांचा था, कबीले का सरदार होता था, आपसी झगड़ों का निपटारा वे गांव में ही कर लेते थे. पुलिस थाना व्यवस्था तब नहीं होती थी.
5वीं अनुसूची में इसी व्यवस्था को ग्रामसभा के रूप में मान्यता दी और उसे ज़मीन बेचने और सरकारी अधिग्रहण संबंधी अधिकार दिए. अपनी भाषा, संस्कृति, पहनावा, रीति-रिवाज़ और बाज़ार की व्यवस्था तय करने का अधिकार मिला कि बाज़ार में क्या बिके, क्या न बिके? गांव चाहता है कि शराब न बिके तो नहीं बिकेगी.
फिर 1996 में 5वीं अनुसूची के परिदृश्य में पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) क़ानून बना. 5वीं अनुसूची में ग्रामसभा पारिभाषित नहीं थी, अब 9 बिंदुओं में पारिभाषित कर दिया गया.
दूसरा, ग्रामसभा के साथ-साथ पंचायती राज व्यवस्था को भी जोड़ा गया. दोनों को गांव के विकास की ज़िम्मेदारी मिली. ये गांव की प्रशासनिक व्यवस्था हुई. ज़िले की प्रशासनिक व्यवस्था करने के लिए ज़िला स्वशासी परिषद (डीएसी) को मान्यता दी.
समस्या यहीं से है कि डीएसी की बॉडी और नियमावली अब तक किसी राज्य ने नहीं बनाई कि उसमें कितने सदस्य हों, उनके काम क्या हों.
यह परिषद स्वायत्त है, मतलब कि इसके पास वित्त का भी प्रबंधन हो. संविधान के अनुच्छेद 275 में ट्राइबल सब-प्लान (टीएसपी) की व्यवस्था है, इसके तहत ऐसे क्षेत्रों के लिए अलग से बजटीय आवंटन होता है जिसका प्रयोग आदिवासियों के कल्याण और उनकी आर्थिक व सामाजिक बेहतरी के लिए होता है. ज़िला स्वशासी परिषद पैसा किस तहसील में, किस ब्लॉक में ख़र्च हो, यह तय करती है.
डॉ. हीरालाल अलावा (दाएं). (फोटो साभार: फेसबुक)
पर जब परिषद ही नहीं बना तो स्वाभाविक है कि टीएसपी का पैसा कहीं न कहीं डायवर्ट किया जा रहा है. जैसे मध्य प्रदेश में टीएसपी का 100 करोड़ रुपया राज्य सरकार ने इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट में दे दिया.
दस्तावेज़ों के सहारे सामने आया ये महज़ एक छोटा सा उदाहरण है. पूरे प्रदेश में यह पैसा कहीं शहरों में विकास के नाम पर तो कहीं अस्पताल और यात्राओं में लगाया जा रहा है.
वहीं, स्वशासन की कल्पना करते हुए जिस ग्रामसभा की बात की गई, वर्तमान में उसके द्वारा लिए गए निर्णय को शासन स्वीकार ही नहीं करता है.
उदाहरण के लिए मनावर तहसील में 32 गांवों का विस्थापन करके ज़मीन अल्ट्राटेक सीमेंट को दे दी गई. 5वीं अनुसूची और वनाधिकार क़ानून के अनुसार, आदिवासी की ज़मीन ग़ैर आदिवासी को स्थानांतरित की ही नहीं जा सकती. फिर भी हज़ारों परिवार की ज़मीन सीमेंट फैक्ट्री को कैसे आवंटित हुई? उनकी सिंचित ज़मीन तक को नहीं छोड़ा गया.
क्या मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में क्षेत्र के आदिवासी जयस के नेतृत्व में प्रदेश सरकार का विरोध करने जा रहे हैं?
बीते 11 मार्च को हमने मनावर में आदिवासी महासम्मेलन करके सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि अगर आदिवासियों की ज़मीन वापस नहीं की जाती है तो वह किसी भी क़ीमत पर सरकार का समर्थन नहीं करेगा. विरोध की बात नहीं है, बस समर्थन नहीं किया जाएगा. मुख्यमंत्री बदला जाएगा.
47 विधानसभा सीटों पर आदिवासियों की पकड़ है, वे आरक्षित हैं. 20 सीटें ऐसी हैं जिन पर जीत-हार में आदिवासियों की भूमिका अहम है. 230 सीटों की विधानसभा में 70 सीटें मायने रखती हैं.
उन्हें ज्ञात है कि उसी बेल्ट में छात्रसंघ चुनावों में हमने 162 सीटें जीती हैं. कई कॉलेज में जयस के समर्थन वाले अध्यक्ष बने हैं. यह हमारा संदेश था, उन लोगों को.
वहीं, हम कांग्रेस और भाजपा किसी के साथ नहीं हैं. कांग्रेस भी लंबे समय तक केंद्र और राज्य में सरकार में रही लेकिन आदिवासी तब भी ठगा गया.
अगर हमारी मांगों पर ग़ौर नहीं होगा तो हम आगामी विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश में जयस समर्थित आदिवासी समुदाय के उम्मीदवार निर्दलीय उतारेंगे. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी हमारा यही प्रयास है.
आपकी मांगें क्या 5वीं अनुसूची के कड़े अनुपालन तक ही सीमित हैं?
ऐसा नहीं है, वनाधिकार क़ानून 2006 की भी हम बात कर रहे हैं. इस क़ानून में दर्ज है कि कई सालों से जिस ज़मीन पर आदिवासी रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं, उनको ज़मीन के स्थायी पट्टे दिए जाएं.
अभी तक सरकार ने पूरे देश में महज़ दो-ढाई लाख पट्टे दिए हैं, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार पूरे देश में दस से 12 करोड़ आदिवासी हैं. 90 प्रतिशत से अधिक किसान आदिवासी हैं.
हमारा कहना है उन्हें स्थायी पट्टे दीजिए. दो-ढाई लाख से काम नहीं चलेगा, करोड़ों की संख्या में दीजिए.
एक अन्य बात कि आज़ादी के बाद से अभी तक जो दस-बारह करोड़ आदिवासी हैं, उनमें से चार करोड़ आदिवासियों को इन्होंने अपने ही जंगल और ज़मीन से विस्थापित कर दिया है.
जैसे कभी टाइगर रिज़र्व के नाम पर, कभी सीमेंट फैक्ट्री के नाम पर. अल्ट्राटेक सीमेंट के नाम तो 32 गांव ही किए. खरगौन और बड़वानी में 244 गांव वाइल्ड लाइफ प्रोजेक्ट सेंचुरी के नाम पर विस्थापित करने की योजना है.
वहां ग्रामसभा बहुत पहले बैठ चुकी है. लगभग पांच-दस साल पहले. अब बस ग्रामीणों को भगाना ही बाकी रह गया है. वहीं, छत्तीसगढ़ के कवर्धा ज़िले में भी टाइगर रिज़र्व के नाम पर ऐसी ही योजना है.